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Thursday, November 5, 2015

".. तू चला चल..."(edited)

All my friends who are reading this poem let me first introduce you all to the basic thought behind this poem....
It is about a message given by a father to his daughter...the girl who is leaving her father and is going to the outside world (society) for the first time..

This motivation is from every FATHER to every DAUGHTER.

...
..
.
हो अगर धूल भरी आँधी
नज़र जब उठाई है
तो इसे ना झुकाना
.
हो राहों में कितने भी काँटे
कदम जब उठाए
तो इन्हें ना डिगाना
.
यूं तू चला चल
बस तू चला चल
.
हैं तूने उठाए जो शश्त्र
तो हाथ से इन्हें ना गिराना
चाहे हो दिल में दुखों का समंदर
फिर भी कभी पलकें ना भिगोना
बस तू चला चल..
.
चाहे दूर हो कितना भी लक्ष्य वो तेरा
लौट के खाली यूं वापस ना आना
यूं तू चला चल..
कि राह मे साथ तू सबका पाना

यूं तू चला चल ...
बस तू चला चल...